D60 चार्ट (षष्ट्यंश) को स्वतंत्र कुंडली की तरह देखने के नियम
D60 चार्ट (षष्ट्यांश कुंडली) को ज्योतिष में सबसे गूढ़ और शक्तिशाली आयुर्दाय चार्ट माना जाता है। पराशर मुनि ने इसे "कर्मफल का सूक्ष्मतम दर्पण" कहा है।
जब हम कहते हैं कि D60 चार्ट को स्वतंत्र कुंडली की तरह देखना है, तो इसका तात्पर्य यह है कि हम इसे सिर्फ D1 (जन्म कुंडली) का पूरक या अंग न मानकर, एक स्वतंत्र ज्योतिषीय इकाई के रूप में विश्लेषित करें। इसका मतलब है कि इस चार्ट का अपना एक लग्न है, अपने भाव हैं, और इन भावों में ग्रहों की स्थिति पिछले जन्मों के संचित कर्मों (सूक्ष्म कर्म) का फल देती है।
नियम 1: D60 के स्वयं के लग्न को प्रधान मानें
D1 चार्ट (जन्म कुंडली) में लग्न भौतिक शरीर और इस जन्म के व्यक्तित्व को दर्शाता है। लेकिन D60 चार्ट में लग्न वह बिंदु है जहां से पिछले जन्मों की कर्म यात्रा शुरू होती है।
- विश्लेषण विधि: D60 में लग्न और लग्नेश की स्थिति को देखें। यह मत सोचें कि "D1 में मेरा लग्न मेष है, तो D60 में भी वैसा ही प्रभाव होगा।" बल्कि, D60 के अपने लग्न को एक नई कुंडली का शीर्ष मानें।
- उदाहरण: मान लीजिए D1 चार्ट में कर्क लग्न है, लेकिन D60 चार्ट बनाने पर मकर लग्न बनता है।इसका मतलब है कि व्यक्ति का बाहरी स्वभाव (D1) संवेदनशील और मातृत्व-प्रेमी (कर्क) है।लेकिन उसकी आत्मा पर पिछले जन्म का गहरा कर्म (D60) अनुशासन, कठोर परिश्रम और महत्वाकांक्षा (मकर) का है।अगर D60 में मकर लग्न का स्वामी शनि 10वें भाव में बैठा है, तो व्यक्ति के पिछले जन्म का कर्म राजनीति, प्रशासन या बड़े संगठनों से जुड़ा रहा होगा।
नियम 2: D60 के भावों का स्वतंत्र विश्लेषण करें
D60 चार्ट के हर भाव (1 से 12) को पूरी तरह से नए सिरे से परिभाषित किया जाता है। ये भाव D1 के भावों के अर्थ से थोड़े भिन्न, अधिक आध्यात्मिक और कर्मिक हो जाते हैं।
- D60 का प्रथम भाव: आत्मा का मूल स्वरूप (पिछले जन्म का सार)।
- D60 का चतुर्थ भाव: आंतरिक सुख, मानसिक शांति, और पिछले जन्म का वातावरण।
- D60 का दशम भाव: आत्मा का धर्म, वह कर्तव्य जिसके लिए आत्मा ने जन्म लिया (Soul's Duty)।
- उदाहरण:स्थिति: D1 में गुरु (बृहस्पति) 4थे भाव में है, जो पारिवारिक सुख देगा।D60 विश्लेषण: उसी व्यक्ति के D60 चार्ट में यदि गुरु 12वें भाव में है और राहु के साथ बैठा है।निष्कर्ष: यह दर्शाता है कि पिछले जन्म में व्यक्ति ने धार्मिक स्थलों (गुरु) को छोड़ दिया था या विदेश (12वां भाव) चला गया था, लेकिन वहां उसने कोई ऐसा कार्य किया जो सामाजिक परंपराओं (राहु) के खिलाफ था। इस जन्म में इस कर्म का प्रभाव उसे बार-बार घर से दूर भेज सकता है।
नियम 3: ग्रहों की युति और दृष्टि को "वैश्विक नियति" की तरह देखें
D60 में ग्रहों की युति को साधारण घटनाओं का परिणाम न मानकर, वैश्विक स्तर पर होने वाली कर्म संरचना माना जाता है।
- नियम: D60 में यदि दो ग्रह मिल रहे हैं, तो वे पिछले जन्म की दो अलग-अलग कर्म शाखाओं के मिलन का प्रतीक हैं।
- उदाहरण: सूर्य-चंद्र युति (Amavasya Yoga)यदि D1 में सूर्य-चंद्र की युति हो, तो व्यक्ति के मन और आत्मा में संघर्ष हो सकता है।D60 में यही युति: यदि D60 चार्ट में सूर्य और चंद्रमा एक साथ 9वें भाव (भाग्य) में बैठे हैं।व्याख्या: यह अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली कर्म है। इसका मतलब है कि पिछले जन्म में व्यक्ति ने आत्मा (सूर्य) और मन (चंद्रमा) दोनों को एक साथ पूरी तरह से ईश्वर (9वां भाव) को समर्पित कर दिया था। ऐसा व्यक्ति इस जन्म में जन्म से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होगा, बिना किसी प्रयास के उसे साधना में सफलता मिलेगी।
नियम 4: भावेशों की आपसी युति (Karmic Intersections)
D60 चार्ट में जब किसी भाव का स्वामी दूसरे भाव में जाता है, तो वह पिछले जन्म के दो क्षेत्रों को आपस में जोड़ता है।
- नियम: D60 में भावेशों की युति को देखना बहुत महत्वपूर्ण है। यह बताता है कि पिछले जन्म के कौन से दो कार्य आपस में उलझे हुए थे।
- उदाहरण: पंचमेश (5th Lord) और अष्टमेश (8th Lord) की युति:D1 में यह युति बुद्धि और अचानक घटनाओं का संबंध दिखाती है।D60 में: 5वां भाव पिछले जन्म के ज्ञान और पुण्य को दर्शाता है, 8वां भाव पिछले जन्म के पापों और छिपे रहस्यों को।अगर D60 में 5वें भाव का स्वामी (बुध) और 8वें भाव का स्वामी (शनि) आपस में मिल रहे हैं या एक-दूसरे के भाव में बैठे हैं, तो यह संकेत है कि पिछले जन्म में व्यक्ति ने अपने ज्ञान (बुध) का उपयोग दूसरों का शोषण करने (शनि) या समाज में हेरफेर करने के लिए किया था। इस जन्म में उसे यह ज्ञान तो मिलेगा, लेकिन उसे लगातार संदेह और अविश्वास का सामना करना पड़ सकता है।
नियम 5: निष्पादन (Conclusion) - D60 में स्थित ग्रह ही अंतिम फल देते हैं
D60 चार्ट को "स्वतंत्र कुंडली" देखने का सबसे बड़ा नियम यह है कि D1 में बने योग तभी पूरे होते हैं जब D60 उनका समर्थन करता है। D60, D1 के वादों को रद्द या स्वीकृत कर सकता है।
- नियम: किसी भी ग्रह को तभी पूर्ण फलदाता माना जाता है जब वह D60 में बलवान हो।
- उदाहरण:D1 स्थिति: D1 चार्ट में गुरु (बृहस्पति) उच्च का है (कर्क राशि में) और केन्द्र (Kendra) में बैठा है। D1 के हिसाब से यह राजयोग है, व्यक्ति को धन-ऐश्वर्य मिलना चाहिए।D60 स्थिति: अब उसी व्यक्ति का D60 चार्ट देखिए। उसमें यह गुरु नीच का है (मकर राशि में) और 6ठे भाव (रोग, शत्रु) में बैठा है।निष्कर्ष (स्वतंत्र दृष्टिकोण): D60 चार्ट यहां मुख्य भूमिका निभाता है। यह बताता है कि पिछले जन्म के कर्म इतने अशुद्ध थे कि इस जन्म का उच्च गुरु भी उन्हें आसानी से नहीं मिटा सकता। व्यक्ति को धन तो मिलेगा, लेकिन साथ में बड़े शत्रु और स्वास्थ्य समस्याएं भी मिलेंगी। D60 ने D1 के शुद्ध राजयोग को "मिश्रित फल" में बदल दिया।
निष्कर्ष
D60 चार्ट को स्वतंत्र कुंडली की तरह देखने का मतलब है कि ज्योतिषी को अपना ध्यान D1 से हटाकर पूरी तरह D60 की ओर मोड़ना होता है।
यह देखना होता है कि D60 का अपना लग्न कैसा है, उसके भावों में ग्रह कैसे बैठे हैं, और कौन से ग्रह परस्पर देख रहे हैं। यह चार्ट हमें बताता है कि हम इस जन्म में जो भुगत रहे हैं, वह किसी दूसरे जन्म की कहानी का अंतिम अध्याय है। D1 वर्तमान है, D60 अतीत का वह बोझ है जिसे हम ढो रहे हैं—इसे स्वतंत्र रूप से समझे बिना कर्मफल का सही ज्ञान संभव नहीं है।
