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Sunday, September 25, 2022

Astrological Causes of Stomach Problems

 

Monday, September 5, 2022

How to do Pitru Paksha puja at home | घर पर कैसे करें पितरों का श्राद्ध

 

How to do Pitru Paksha puja at home




महाभारत और पद्मपुराण सहित अन्य स्मृति ग्रंथों में कहा गया है कि जो पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त सामर्थ्य के अनुरूप पूरी विधि से श्राद्ध करता है, उसकी इच्छाएं पूरी होती हैं। घर-परिवार में शांति होती है। व्यवसाय तथा आजीविका में उन्नति होती है। साथ ही हर तरह की रुकावटें दूर हो जाती हैं।

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इस तरह घर पर ही कर सकते हैं श्राद्ध और तर्पण - 

1 - श्राद्ध तिथि पर सूर्योदय से दिन के 12 बजकर 24 मिनट की अवधि के बीच ही श्राद्ध करें। 

2 - इसके लिए सुबह उठकर नहाएं, उसके बाद पूरे घर की सफाई करें। घर में गंगाजल और गौमूत्र भी छीड़कें। 

3 - दक्षिण दिशा में मुंह रखकर बांए पैर को मोड़कर, बांए घुटने को जमीन पर टीका कर बैठ जाएं। इसके बाद तांबे के चौड़े बर्तन में काले तिल, गाय का कच्चा दूध, गंगाजल और पानी डालें। उस जल को दोनों हाथों में भरकर सीधे हाथ के अंगूठे से उसी बर्तन में गिराएं। इस तरह 11 बार करते हुए पितरों का ध्यान करें। 

इस दौरान ‘ॐ आगच्छन्तु में पितर और ग्रहन्तु जलान्जलिम’ का जप करें. अब उसे पितरों का नाम लेते हुए पृथ्वी पर गिरा दें. इसी तरह 5, 7 या 11 बार अंजली दें. जीवन में सुख शांति और समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना करें.  जिस तिथि को आपके पितरों की मृत्यु हुई हो. उस तिथि को उनके नाम से अपनी श्रद्धा और यथाशक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन करवाएं. भोजन कौओं और कुत्तों को भी खिलाएं.  

4 - घर के आंगन में रंगोली बनाएं। महिलाएं शुद्ध होकर पितरों के लिए भोजन बनाएं। श्राद्ध के अधिकारी व्यक्ति यानी श्रेष्ठ ब्राह्मण को न्यौता देकर बुलाएं। ब्राह्मण को भोजन करवाएं और  निमंत्रित ब्राह्मण के पैर धोने चाहिए। ऐसा करते समय पत्नी को दाहिनी तरफ होना चाहिए। 

5 - पितरों के निमित्त अग्नि में गाय के दूध से बनी खीर अर्पण करें। ब्राह्मण भोजन से पहले पंचबलि यानी गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए भोजन सामग्री पत्ते पर निकालें।

6 - दक्षिणाभिमुख (दक्षिण दिशा में मुंह रखकर) होकर कुश, जौ, तिल, चावल और जल लेकर संकल्प करें और एक या तीन ब्राह्मण को भोजन कराएं। इसके बाद भोजन थाली अथवा पत्ते पर ब्राह्मण हेतु भोजन परोसें।

7 - प्रसन्न होकर भोजन परोसें। भोजन के उपरांत यथाशक्ति दक्षिणा और अन्य सामग्री दान करें। इसमें गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, अनाज, गुड़, चांदी तथा नमक (जिसे महादान कहा गया है) का दान करें। इसके बाद निमंत्रित ब्राह्मण की चार बार प्रदक्षिणा कर आशीर्वाद लें। ब्राह्मण को चाहिए कि स्वस्तिवाचन तथा वैदिक पाठ करें तथा गृहस्थ एवं पितर के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त करें।

8 - श्राद्ध में सफेद फूलों का ही उपयोग करें। श्राद्ध करने के लिए दूध, गंगाजल, शहद, सफेद कपड़े, अभिजित मुहूर्त और तिल मुख्य रूप से जरूरी है।


पितृ पक्ष का महत्व
खुशहाल और संपन्न जीवन व्यतीत करने के लिए बेहद आवश्यक होता है कि हमारे जीवन में पितरों का आशीर्वाद बना रहे. हालांकि यदि किसी गलती की वजह से हमारे पितृ हमसे नाराज हो जाए तो इससे व्यक्ति के जीवन में पितृदोष जैसा बड़ा दोष लग जाता है. ऐसे में पितृपक्ष का यह समय पितृदोष जैसे गंभीर दोष से छुटकारा पाने और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए बेहद ही फलदाई बताया गया है. इस दौरान किए जाने वाले कर्मकांड और पूजा आदि से हमारे पितृ प्रसन्न होते हैं और हमारे जीवन में सुख समृद्धि का आशीर्वाद बनाए रखते हैं.


श्राद्ध विधि
श्राद्ध में तिल, चावल, जौ, कुश आदि का विशेष महत्व बताया गया है. इसके अलावा इन सब में सबसे ज्यादा तिल और कुश का महत्व होता है. किसी भी मृत व्यक्ति का श्राद्ध उनके पुत्र, उनके भाई, या फिर पौत्र, पर पौत्र, और महिलाएं भी कर सकती हैं. हालांकि पुराणों में इस बात का स्पष्ट रूप से जिक्र किया गया है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को ही होता है.


श्राद्ध में कौवों का महत्व
श्राद्ध के दौरान कौवों का विशेष महत्व बताया गया है. इस दौरान गलती से भी कौवों का अनादर न करें और हमेशा उनके लिए खाना बना कर निकालें. ऐसा इसलिए क्योंकि उनको पितरों का रूप माना जाता है. कहते हैं कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितृ कौवों का रूप धारण करके हमारे घर आते हैं. ऐसे में अगर हम गलती से भी उनका अनादर करते हैं या उन्हें भोजन नहीं देते या फिर उन्हें दुत्कार देते हैं तो इससे हमारे पितृ हमसे क्रोधित हो जाते हैं और ऐसा करने से हमारे जीवन पर पितृदोष भी लग सकता है. यही वजह है कि हमेशा श्राद्ध का पहला भोजन कौवों को दिया जाता है



The Pooja Vidhi is as follows:ENGLISH

Place a wooden stool in the southern direction. Take a white cloth and cover the stool. On the cloth, spread barley seeds and black sesame seeds. Keep a photograph of your ancestor on it. Instead of the photograph, you can also use Kusha grass, as it is believed to have Lord Vishnu particles in it. The next step is to invite the ancestor or ancestors for whom the pooja is held. Call their name (including surname) in this manner, “We, the entire family, invite you to visit our home during this period of Pitru Paksha.”Then take a bronze or copper utensil and fill it with water. To this, add some cow’s milk (raw), sesame seeds, rice, barley, too. Then keep the vessel before the image.  


The mantra chanted during this puja is -

“ये बान्धवा बान्धवा वा ये न्यजन्मनि बान्धवा:।

ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्र्चास्मत्तो भिवाञ्छति।।”

Making the Pinda 

Take cooked rice and add honey, milk, and gangajal. Make a ball of this rice mixture and keep it before the ancestor’s image. The rice ball should be placed on a leaf. The ball is called Pinda, and it’s used in the Pinda Daan ritual. After completing the ritual, the rice ball can be offered to a cow. If there is a river nearby, it can be immersed in the river also.

Another method 

In case, you cannot perform the abovementioned ritual, there is another method. Take a roti and put a little ghee and jaggery on it. This should be offered to the ancestor by placing it before the ancestor’s image. This can be done every day, and then the roti can be given to a cow. Apart from this pooja, you must also invite a priest to your home and offer him food and new clothes on this day. 

Jaggery and Ghee Offering 

Yet another offering to ancestors is possible. A cow dung cake should be burnt almost completely, and then some ghee should be poured on it. Then keep a small bit of jaggery on it. If the jaggery piece is fully burnt, we can conclude that the ancestors have consumed it. 

By performing the Pitru Paksha Amavasya Pooja, we express our gratitude to our ancestors. It is a way to honor and remember them for all that they have given us. When we perform the Pooja, we will receive their blessings as they will be pleased with us. This will enable us to lead a happy and prosperous life. 


Sarvapitri Amavasya is the last of the Pitru Paksha. On this day, if one does not know about the death of any deceased soul, they can perform their Shradh on this occasion. Another ritual known as Tarpan, done with Indian puja items, include feeding all the Brahmins and doing pind daan to please the dead ancestors. The offering given consist of ghee, honey, sugar, ice, and the milk fo the cow. On the day of Tarpan, an offering is made with water mixed with grass, barley, white flour, kusha grass, black sesame to reduce the effect of the evil Sarpa Dosha.

Wednesday, August 17, 2022

Krishna Janmashtami Puja Vidhi and Mantra : जन्माष्टमी व्रत पूजा विधि मंत्र सहित विस्तार से, ऐसे करें कान्हा की पूजा

 

Krishna Janmashtami Puja Vidhi and Mantra : जन्माष्टमी व्रत पूजा विधि मंत्र सहित विस्तार से, ऐसे करें कान्हा की पूजा


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि मंत्र जानिए विस्तार से ताकि जन्माष्टमी की पूजा में आपसे किसी प्रकार की चूक न हो। कहते हैं जो श्रद्धालु भक्त जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण की विधि पूर्वक पूजा करते हैं वह पाप मुक्त होकर उत्तम गति और सुख पाते हैं।

पूजन सामग्री: लड्डू गोपाल की मूर्ति, एक सिंहासन, पीले वस्त्र, मोरमुकुट, बांसुरी, छोटी गाय की मूर्ति, पीला चंदन, अक्षत, गंगाजल, पंचामृत, गाय का दूध, दही, शहद, एक खीरा, गाय का घी, दीपक, बाती, धूपबत्ती, तुलसी दल, माखन, मिश्री तथा अन्य भोग सामग्री।


जन्माष्टमी पूजा विधि
रात्रि 12 बजे शुभ मुहूर्त में लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान करवाकर उन्हें नए पीले रंग के नए वस्त्र पहनाएं और उनका कुंडल, मुकुट, वैजयंती माला आदि से शृंगार करें। इसके बाद कान्हा जी को सिंहासन पर बिठाकर चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, फल आदि पूजन सामग्री अर्पित करें। इसके पश्चात कृष्ण भगवान की धूप, दीप से आरती करें। फिर माखन, मिश्री, तुलसी दल समेत सभी भोग सामग्री चढ़ाएं। मान्यता है कि जन्माष्टमी के दिन कान्हा जी को झूला झुलाने से वे प्रसन्न होते हैं। तत्पश्चात कान्हा जी के समक्ष हाथ जोड़कर मन में प्रार्थना करें। इसके बाद भोग बांटकर और स्वयं ग्रहण करके व्रत का पारण करें।


 जन्माष्टमी का त्योहार हर साल भाद्र मास की कृष्णजन्माष्टमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हर साल की तरह इस साल भी भाद्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनायी जाएगी। पुराणों के अनुसार इसी तिथि में श्रीकृष्ण ने कंस के कारागार में जन्म लिया था और वासुदेवजी ने कान्हा को रातोंरात नंदगांव पहुंचा दिया था। अगले दिन नंदगांव में कन्हा का जन्मोत्सव मनाया गया था। इसी परंपरा के अनुसार भाद्र मास में कृष्ण पक्ष में जिस रात मध्य रात्रि में अष्टमी तिथि होती है उस रात को जन्माष्टमी और अगले दिन जन्मोत्सव मनाते हैं। दोनों दिन श्रीकृष्ण की विशेष पूजा अर्चना करते हैं। श्रीकृष्ण पूजा मंत्र विधि सहित आप भी जानिए और इस जन्माष्टमी आप भी विधि विधान सहित श्रीकृष्ण की पूजा करके अपने जीवन को सफल और सुखी बनाएं।श्रीकृष्ण की पूजा करते समय सबसे पहले इनकी प्रतिमा या तस्वीर के समक्ष हाथ में जल लेकर बोलें-


ओम अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोअपि वा। 
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।। 
जल को स्वयं पर और पूजन सामग्री पर छींटे लगाकर पवित्र करें।


हाथ में फूल लेकर श्रीकृष्ण का ध्यान करें :
वसुदेव सुतं देव कंस चाणूर मर्दनम्। 
देवकी परमानंदं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।। 
हे वसुदेव के पुत्र कंस और चाणूर का अंत करने वाले, देवकी को आनंदित करने वाले और जगत में पूजनीय आपको नमस्कार है।


जन्माष्टमी पूजन संकल्प मंत्र :
‘यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः कार्य सिद्धयर्थं कलशाधिष्ठित देवता सहित, श्रीजन्माष्टमी पूजनं महं करिष्ये।
हाथ में जल, अक्षत, फूल या केवल जल लेकर भी यह संकल्प मंत्र बोलें, क्योंकि बिना संकल्प किए पूजन का फल नहीं मिलता है।

भगवान श्रीकृष्ण आवाहन मंत्रः
जिन्होंने भगवान की मूर्ति बैठायी है उन्हें सबसे पहले हाथ में तिल जौ लेकर मूर्ति में भगवान का आवाहन करना चाहिए, आवाहन मंत्र- 
अनादिमाद्यं पुरुषोत्तमोत्तमं श्रीकृष्णचन्द्रं निजभक्तवत्सलम्। 
स्वयं त्वसंख्याण्डपतिं परात्परं राधापतिं त्वां शरणं व्रजाम्यहम्।। 
तिल जौ को भगवान की प्रतिमा पर छोड़ें।

आसन मंत्र :
अर्घा में जल लेकर बोलें- रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्वासौख्यकरं शुभम्। 
आसनं च मया दत्तं गृहाण परमेश्वर।। 
जल छोड़ें।

भगवान को अर्घ्य दें :
अर्घा में जल लेकर बोलें- अर्घ्यं गृहाण देवेश गन्धपुष्पाक्षतैः सह। 
करुणां करु मे देव! गृहाणार्घ्यं नमोस्तु ते।। 
जल छोड़ें।



आचमन मंत्र :
अर्घा में जल और गंध मिलाकर बोलें- सर्वतीर्थसमायुक्तं सुगन्धं निर्मलं जलम्। 
आचम्यतां मया दत्तं गृहत्वा परमेश्वर।। 
जल छोड़ें।

स्नान मंत्र :
अर्घा में जल लेकर बोलें- गंगा, सरस्वती, रेवा, पयोष्णी, नर्मदाजलैः। 
स्नापितोअसि मया देव तथा शांति कुरुष्व मे।।
 जल छोड़ें।


पंचामृत स्नान :
अर्घा में गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद मिलाकर भगवान श्रीकृष्ण को यह मंत्र बोलते हुए पंचामृत स्नान कराएं- 
पंचामृतं मयाआनीतं पयोदधि घृतं मधु। 
शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।। 
भगवान को स्नान कराएं।

अर्घा में जल लेकर भगवान को फिर से एक बार शुद्धि स्नान कराएं।

भगवान श्रीकृष्ण को वस्त्र अर्पित करने का मंत्र :
हाथ में पीले वस्त्र लेकर यह मंत्र बोलें- 

शीतवातोष्णसन्त्राणं लज्जाया रक्षणं परम्। 
देहालअंगकरणं वस्त्रमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।

 भगवान को वस्त्र अर्पित करें।

यज्ञोपवीत अर्पित करने का मंत्र:
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। 
आयुष्मयग्यं प्रतिमुन्ज शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

 इस मंत्र को बोलकर भगवान को यज्ञोपवीत अर्पित करें।

चंदन लगाने का मंत्र:
फूल में चंदन लगार मंत्र बोलें- 

श्रीखंड चंदनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। 
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चंदनं प्रतिगृह्यताम्।। 

भगवान श्रीकृष्ण को चंदन लगाएं।

भगवान को फूल चढाएंः
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। 
मयाआहृतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम्।। 
भगवान को फूल अर्पित करने के बाद माला पहनाएं।

भगवान को दूर्वा चढाएंः
हाथ में दूर्वा लेकर मंत्र बोलें – दूर्वांकुरान् सुहरितानमृतान्मंगलप्रदान्। आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण परमेश्वर।।

भगवान को नैवेद्य भेंट करेंः
इदं नाना विधि नैवेद्यानि ओम नमो भगवते वासुदेवं, देवकीसुतं समर्पयामि।

भगवान को आचमन कराएंः
इदं आचमनम् ओम नमो भगवते वासुदेवं, देवकीसुतं समर्पयामि।

इसके बाद भगवान को पान सुपारी अर्पित करके प्रदक्षिणा करें और यह मंत्र बोलें- 
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। 
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे-पदे।

Aarti krishna Bhajan Aarti Kunj Bihari Ki : आरती कुंजबिहारी की कुंजबिहारी की, गिरिधर कृष्णमुरारी की


आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।


आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,

ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;

अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;

चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद।।

टेर सुन दीन भिखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥