महाशिवरात्रि: विधिवत पूजन से प्राप्त होता है भोले भंडारी का अनंत आशीर्वाद
महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है। यह वह पावन रात्रि है जब साधक, भक्त और योगी सभी शिव आराधना में लीन हो जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन शिवलिंग की उत्पत्ति हुई थी और भगवान शिव तांडव नृत्य करते हुए ब्रह्मांड में लीन हुए थे। इसलिए, इस रात की पूजा-आराधना का विशेष महत्व है। महाशिवरात्रि की पूजा चार प्रहर (रात के चार पहर) में की जाती है, जिसमें प्रत्येक प्रहर में एक ही विधि से पूजन किया जाता है। आइए, इस पूजन विधि को विस्तार से समझते हैं।
पूजन की तैयारी एवं संकल्प
महाशिवरात्रि के दिन प्रात:काल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शांत मन से ध्यान करें और भगवान शिव का स्मरण करते हुए व्रत एवं पूजा का संकल्प लें। संकल्प लेते समय यह प्रार्थना करें कि आप पूरी श्रद्धा और नियमों से पूजन करके भोलेनाथ की कृपा पाना चाहते हैं।
पूजा स्थल की स्थापना
यदि आप घर पर पूजा कर रहे हैं, तो सबसे पहले एक साफ और पवित्र स्थान चुनें। वहां एक पाट (चौकी) रखें और उस पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं। इसके बाद घट एवं कलश की स्थापना करें। कलश को जल से भरकर, उसके मुख पर आम के पत्ते रखें और नारियल स्थापित करें। कलश सृष्टि का प्रतीक माना जाता है।
इसके पश्चात, एक बड़ी सी थाली या ट्रे में शिवलिंग या शिवमूर्ति को स्थापित करें। यदि शिवलिंग न हो, तो सफेद कपड़े पर शिवजी का चित्र या यंत्र भी रख सकते हैं। इस थाली को पाट पर स्थापित करें। धूप-दीप जलाकर पूजा स्थल का शुद्धिकरण करें और वातावरण को पवित्र बनाएं।
कलश पूजन एवं शिव अभिषेक
सर्वप्रथम कलश की पूजा करें। कलश पर चावल, फूल चढ़ाएं और उसका आचमन करें। कलश पूजन के बाद शिवमूर्ति या शिवलिंग का जल से अभिषेक करें। अभिषेक का अर्थ है – दिव्य जल से स्नान कराना। इसके लिए पवित्र जल, गंगाजल या दूध का उपयोग कर सकते हैं। अभिषेक करते समय 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करें।
इसके बाद पंचामृत से स्नान कराएं। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर को मिलाकर बनता है। यह पांच अमृत तत्वों का प्रतीक है। पंचामृत से अभिषेक के बाद पुनः शुद्ध जल से शिवलिंग को स्नान कराएं। यह संपूर्ण प्रक्रिया शरीर और आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है।
श्रृंगार एवं सामग्री अर्पण
अभिषेक के बाद शिवजी के मस्तक पर चंदन, भस्म और लाल चंदन लगाएं। चंदन शीतलता प्रदान करता है तो भस्म त्याग और वैराग्य का प्रतीक है। फिर शिवजी को हार और फूल चढ़ाकर उनका श्रृंगार करें। पूजन में विशेष ध्यान रखें कि अनामिका अंगुली (रिंग फिंगर) का ही उपयोग इत्र, गंध, चंदन आदि लगाने में करें। मान्यता है कि यह अंगुली सीधे हृदय से जुड़ी होती है और भक्ति की शुद्धता बनाए रखती है।
इसके बाद 16 प्रकार की सामग्री (षोडशोपचार) एक-एक करके अर्पित करें। इनमें आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नान, वस्त्र, उपवस्त्र, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, दक्षिणा और प्रदक्षिणा शामिल हैं। प्रत्येक वस्तु अर्पित करते समय संबंधित मंत्रों का उच्चारण करें। सामग्री अर्पित करने का क्रम पूर्व निर्धारित है और इसे बदलना नहीं चाहिए।
नैवेद्य अर्पण एवं आरती
पूजन के बाद प्रसाद या नैवेद्य (भोग) चढ़ाएं। शिवजी को भोग लगाने के लिए फल, मिठाई, खीर आदि शुभ वस्तुएं चढ़ाई जा सकती हैं। ध्यान रखें कि नैवेद्य में नमक, मिर्च और तेल का प्रयोग नहीं किया जाता है। भोलेनाथ को बेलपत्र, धतूरा, भांग आदि भी प्रिय हैं, लेकिन इनका प्रयोग शास्त्रानुसार और संयम से ही करें।
नैवेद्य अर्पित करने के बाद अंत में शिवजी की आरती करें। आरती करते समय 'ॐ जय शिव ओंकारा' या कोई अन्य शिव आरती गाएं। दीपक को घुमाते हुए भगवान शिव का ध्यान करें। आरती के बाद सभी उपस्थित लोगों को प्रसाद वितरित करें। प्रसाद ग्रहण करने से पहले भोलेनाथ का आभार प्रकट करें।
महाशिवरात्रि के पूजन में दो मंत्रों का विशेष महत्व है:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
इस मंत्र का जाप करने से मृत्यु का भय दूर होता है और दीर्घायु प्राप्त होती है।
ॐ नम: शिवाय।
यह मंत्र शिव भक्ति का सार है और इसे जपने से मन शांत होता है तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है।
महाशिवरात्रि की पूजा केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है। चार प्रहर की यह पूजा भक्त को आंतरिक शक्ति, धैर्य और एकाग्रता प्रदान करती है। प्रत्येक प्रहर में इसी विधि से पूजन करने से भक्त का मन शिवचेतना में लीन हो जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन के कठिन समय में भी शिव की भक्ति और ध्यान हमें मजबूती प्रदान करते हैं। इसलिए, पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से महाशिवरात्रि का व्रत रखकर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करें। हर हर महादेव! #shivratri #jyotishgher #shiv
